कार्ल मार्क्स के ऐतिहासिक वस्तुबाद क्या है?- हिंदी में
इतिहास किसके कार्यो के द्वारा निर्धारित होता है ? क्या समाज के शक्तिशाली व्यक्ति इसका निर्धारण करते है या फिर करते है राजा-महाराजा?
इन्ही प्रश्नो का एक अति महत्वपूर्ण उत्तर दिआ था दुनिआ के महान समाज दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने, जिनका जनम हुआ था जर्मनी के टियर शहर में सन 1818 के 5 मई को।
सबसे पहले तो मार्क्स एक अर्थ-राजनैतिक दार्शनिक थे, जिनके ज्यादातर सोच और रचनाये मानब कल्याण के अनुरूप थे।
शायद एहि वो कारण है जिसके वजह से उनको एक समाजशास्त्रबिद का सम्मान भी प्राप्त हुआ, केबल एहि नहीं इसी करणवर्ष आज उनको समाजशास्त्रोबिदो के सुषि में सबसे ऊपर के स्थान पर भी रखा जाता है।
शायद एहि वो कारण है जिसके वजह से उनको एक समाजशास्त्रबिद का सम्मान भी प्राप्त हुआ, केबल एहि नहीं इसी करणवर्ष आज उनको समाजशास्त्रोबिदो के सुषि में सबसे ऊपर के स्थान पर भी रखा जाता है।
अब आईए जानने की कोसिस करते है की उन्होने ऐतिहासिक भौतिकताबाद की सिद्धांत के माध्यम से क्या समझाने की कोसिस किआ है ?
कार्ल मार्क्स के अनुसार इतिहास किसी महान व्यक्तिओ के कार्य और इच्छा निर्धारित नहीं करते और ना ही कर सकते है, क्यों की इसका निर्धारण सामान्य व्यक्तिओ के कार्य और इच्छा से ही होता है।
महान व्यक्ति या फिर राजा-महाराजा उन सामूहिक इच्छाओ का केबल नतृत्व वहन करते है, उनको अपने इच्छा अनुसार परिचालित नहीं कर सकते।
पूरी दुनिआ इसी तरीके से चलती आ रही है और आगे भी ऐसे ही चलती रहेंगी।
पूरी दुनिआ इसी तरीके से चलती आ रही है और आगे भी ऐसे ही चलती रहेंगी।
उदाहरण के रूप में मान लीजिए अमेरिका के स्वतंत्रता यूद्ध में जॉर्ज वाशिंगटन ने नतृत्व लिआ था, और उनकी उस महान कार्य के वजह से आज भी उनको उस देश में उच्च स्थान दिआ जाता है।
लेकिन यहि पर एक प्रश्न आता है की अगर अमेरिका के सामान्य लोग ब्रिटिश साम्राज्य के साथ ही रहना चाहता तो क्या आज अमेरिका का इतिहास बदलता या फिर वैसा ही रहता ?
क्या वाशिंगटन जैसे महान नेता अकेले ही इतिहास बदल पाते ?
क्या वाशिंगटन जैसे महान नेता अकेले ही इतिहास बदल पाते ?
बिलकुल नहीं, क्योकि जब तक समाज के सामान्य व्यक्ति इतिहास परिवर्तन के लिए तत्पर नहीं होता है तब तक मानब समाज वैसे ही चलता रहता है, जैसे वो पहले था ।
कार्ल मार्क्स का ऐतिहासिक वस्तुबाद इसी मुद्दे पर कार्य करते है।
मार्क्स के अनुसार भौतिक प्रोयोजन ही मानब समाज को एक स्तर से दूसरे स्तर तक ले जा रही है और आगे भी ले जाती रहेंगी।
मार्क्स के अनुसार भौतिक प्रोयोजन ही मानब समाज को एक स्तर से दूसरे स्तर तक ले जा रही है और आगे भी ले जाती रहेंगी।
समाज हमेसा ही एक पद्धति के ऊपर नहीं चल सकता।
अन्न, वस्त्रो, और स्थान की जरूरत पूरा करने के लिए इंसान एक पद्धति के ऊपर निर्भरशील होता है।
लेकिन समय बीतते बीतते उस पद्धति की क्रियाशीलता कम होता जाता है और एक समय ऐसा आता है की पूरा पुराण पद्धति ही बदल देना परता है।
क्योकि वो पद्धिति सामान्य लोगो की इन तीन सामान्य जरूरतो को पूरा करने अशक्षम हो जाती है।
अन्न, वस्त्रो, और स्थान की जरूरत पूरा करने के लिए इंसान एक पद्धति के ऊपर निर्भरशील होता है।
लेकिन समय बीतते बीतते उस पद्धति की क्रियाशीलता कम होता जाता है और एक समय ऐसा आता है की पूरा पुराण पद्धति ही बदल देना परता है।
क्योकि वो पद्धिति सामान्य लोगो की इन तीन सामान्य जरूरतो को पूरा करने अशक्षम हो जाती है।
इतिहास परिवर्तन के दिशा में मानब के इस भौतिक निर्भरशीलता को ही दार्शनिक मार्क्स ने ऐतिहासिक वस्तुबाद नाम से नामांगकृत किआ है।
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कार्ल मार्क्स के ऐतिहासिक बस्तुबाद के जरिए मानब समाज परिवर्तन का छ भाग हिंदी में
भौतिक वस्तुबाद के ऊपर निर्भर होके ही मानब समाज आज इस स्तर तक पहुचा है, इसका व्याख्या करते हुए मार्क्स ने समाज विकाश को छ भाग में बाटा है और वो है आदिम, दासत्व ,जमीदारी, पूजिबादी, समाजबादी और साम्यबादी स्तर।
कार्ल मार्क्स कहते है की समाज जब आदिम स्तर पर था तब लोगो को कोई भी श्रेणी शंघर्ष का सामना नहीं करना परता था।
उस समय जनसंख्या बहुत ही कम था, इसीलिए लोगो को अपने नित्य प्रोयोजनो को पूरा करने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी परती थी।
लेकिन समय बीतते बीतते जनसंख्या बढ़ने लगे और समाज में लोगो के प्रयोजनों को पूरा करने के लिए भी द्वन्द आरम्भ होने लगे।
लेकिन समय बीतते बीतते जनसंख्या बढ़ने लगे और समाज में लोगो के प्रयोजनों को पूरा करने के लिए भी द्वन्द आरम्भ होने लगे।
इस समय पर जो लोग शारीरिक रूप से ज्यादा शक्तिशाली थे वो लोग दुर्बल लोगो को अपने दास बनाके रखने लगे, इस स्तर को दार्शनिक मार्क्स दासत्व का स्तर बोलते है।
जब समाज में और भी जनसंख्या बढ़ने लगे तब व्यक्तिओ का जो नित्य प्रोयोजन थे उसको पूर्ण करने के लिए और भी ज्यादा प्रतियोगिता होने लगे।
दासत्व के स्तर में जो लोग दुर्बलों को दास बनाके रखते थे इस स्तर में वो लोग जमींदार बनने लगे और दासो को अपने जमीन पर कार्य करवाने लगे।
दासत्व के स्तर में जो लोग दुर्बलों को दास बनाके रखते थे इस स्तर में वो लोग जमींदार बनने लगे और दासो को अपने जमीन पर कार्य करवाने लगे।
Marxism- के अनुसार इसी को जमींदारी प्रथा का प्रारम्भ माना जाता है।
जमींदार धीरे धीरे बहुत सारे सम्पत्तिओंका अधिकारी होने लगे जो बाद में धीरे धीरे जाके पूंजीवादी व्ह्याबस्था का निर्माण करते में जिम्मेदार रहे।
जमींदार धीरे धीरे बहुत सारे सम्पत्तिओंका अधिकारी होने लगे जो बाद में धीरे धीरे जाके पूंजीवादी व्ह्याबस्था का निर्माण करते में जिम्मेदार रहे।
पूंजीवादी समाज में बहुत ही ज्यादा श्रेणी शंघर्ष होता है, जहा पर श्रमिको को बहुत शोषण किआ जाता है।
इसके कारण एक समय ऐसा आता है की विश्व के पूरी श्रमिक श्रेणी एक होके पूंजीवाद का पूरा बिनाश कर डालता है और क्षमता खुद के हाथ में रखकर समाजबाद प्रतिष्ठा करता है और बाद में जाके यही समाजबाद साम्यबाद का जनम देता है।
इसके कारण एक समय ऐसा आता है की विश्व के पूरी श्रमिक श्रेणी एक होके पूंजीवाद का पूरा बिनाश कर डालता है और क्षमता खुद के हाथ में रखकर समाजबाद प्रतिष्ठा करता है और बाद में जाके यही समाजबाद साम्यबाद का जनम देता है।
साम्यबादी अवस्था में कोई भी श्रेणी शंघर्ष नहीं रहता। यहा सब लोग एक समान होते है और बिना कोई भेदभाब से जीता है।
मार्क्स के मतानुसार प्रत्येक मानब समाज का परम लक्ष साम्यबाद ही है।
मार्क्स के मतानुसार प्रत्येक मानब समाज का परम लक्ष साम्यबाद ही है।
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