Wednesday, 26 December 2018

समाजशास्त्रीक सोच

समाजशास्त्रीक सोच   


समाजशास्त्रीक सोच (Sociological Thought in Hindi) वो सोच होता है जिसके जरिए कोई व्यक्ति या फिर कोई समाजशास्त्री मानव समाज में हो रहे बिभिन्न प्रकार के घटना-परिघटनाओं के ऊपर गंभीरता से अध्ययन करते है, ताकि उस अध्ययन के माध्यम से वे उस घटना के अंतराल में छिपे हुए रहस्य को उद्घाटन कर पाए। 

जैसे की मान लीजिए किसी मानव समाज में नारी की सामाजिक स्थान अति निम्न होता है। 

तो अगर कोई समाजशास्त्रीक उस घटना को अध्ययन करने जायेगा तो उनको सबसे पहले अपने सोच के साथ समाज को संयुक्त करना होगा और फिर उनको उस विशेष विषय के ऊपर अध्ययन करना होगा।

एक बाक्य में कहे तो समाजशास्त्रीक सोच वो होता है जिसको कोई समाजशास्त्रीक या फिर कोई सामान्य व्यक्ति मानव समाज के भले के लिए समाज को ही केंद्र करके और सामाज के ही घटना के ऊपर उसकी रहस्य उद्घाटन करने हेतु करता है। 

हालाकि उस रहस्य उद्घाटन के पीछे उस समाजशास्त्री का उद्देश्य भिन्न प्रकार के हो सकते है। जैसे की किसी प्रतिष्ठित सिद्धांत को पुनः परीक्षा करना, सामाजिक समस्या का समाधान करना, इत्यादि इत्यादि।   
समाजतात्विक सोच, Sociological Thought in Hindi
Image Credit: Pixabay.com

समाजशास्त्रीक सोच के कुछ महत्वपूर्ण चरित्र 


1. मानव समाज: - कोई भी समाजशास्त्रीक सोच मानव समाज के बिना संभव नहीं हो सकती। मानव समाज को केंद्र करके ही ये संभव हो पाता है। 

जैसे की अगर आप भारतीय समाज में नारी की सामाजिक प्रस्थिति को अध्ययन करोगे तो आपको भारतबर्ष के समाज व्यबस्था को केंद्र करना होगा। 


उसी तरह अगर आप हिन्दू धर्म के ऊपर अध्ययन करोगे तो आपको हिन्दू समाज व्यबस्था के बिभिन्न दिशाओ के ऊपर निर्भर करना होगा। 


2. मानव समाज की हिट से जुड़ा हुआ : - समाजशास्त्रीक सोच का और एक अन्यतम चरित्र है की ये हमेशा ही मानव समाज की हिट से जुड़ा हुआ होता है। 

अगर किसी सोच से समाज का भला नहीं होता या केवल अपकार ही होता है तो हम उसको समाजशास्त्रीक सोच नहीं बोल सकते। 


उदहारण के रूप में : - जैसे की चोरी करने के हजार तरीके ढूंढ़ना, शराब बेचने के हज़ार उपाय ढूंढ़ना इन सभी को समाजशास्त्रीक सोच नहीं बोल सकते। 


3. परिवर्तनशीलता: -  जिस तरह वैज्ञानिक सत्य हमेशा ही अपरिवर्तित रहते है उस तरह समाजशास्त्रीक सोच अपरिवर्तित नहीं होता।  

क्योकि समाजशास्त्रीक सोच व्यक्ति मन, सोच से जुड़ा हुआ होता है और ये तो हम सभी जानते है व्यक्ति के मन या सोच समय समय पर बदलता रहता है। 


4. समस्याओ से विकाश: -  समाज में जन्मे समस्याओ से ही इसका विकाश होता है। अगर आप समाजशास्त्र की जन्म इतिहास अध्ययन करोगे तो आपको पता चलेगा की फ्रेंच revolution से जन्मे समस्याओ को अध्ययन करने के कारण ही समाजशास्त्र का जन्म हुआ।  

इसका मूल उदहारण है महान दार्शनिक अगस्त कोम्टे का Positivism पद्धिति। इसी तरह अन्य ज्यादातर समाजशास्त्रीक सिद्धांत भी सामाजिक समस्याओ को समाधान करने हेतु ही विकशित हुआ है। 


5. अतीत के ऊपर निर्भरशील: - ये हमेशा ही अतीत के ऊपर निर्भरशील होता है। अतीत के समाज व्यबस्था के बारे में जाने बिना समाजशास्त्रीक सोच या अध्ययन संभव नहीं हो सकता।


6. सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव : - सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव भी इस विषय के ऊपर भारी  मात्रा में पड़ता है। क्योकि लोगो के सोच तथा सभ्यता और संस्कृति के विकाश के साथ साथ ही समाजशास्त्रीक सोच का विकाश होता है।


7. अगल अलग सिद्धांत: - दो अलग अलग व्यक्ति के दुवारा की गयी समाजशास्त्रीक सोच का सिद्धांत अगल अलग निकल सकता है। क्योकि व्यक्ति के आवेग-अनुभूतिओं दुवारा भी ये कई बार ये प्रभावित होते है (हालाकि नहीं होनी चाहिए)