मैक्स वेबर की आदर्श रूप (Max Weber Ideal
Type Theory In Hindi)
दोस्तों आज हम इस लेख में महान जर्मन दार्शनिक मैक्स वेबर की आदर्श रूप (Max Weber Ideal
Type In Hindi) सिद्धांत के बारे में जानेंगे। क्या आपको पता है की आदर्श रूप क्या होता है, इसका प्रारम्भ कहाँ होता है और ये किस तरह अपना कार्य करता है ?
अगर हाँ तो बिलकुल अच्छी बात है लकिन अगर नहीं तो भी कोई बुरी बात नहीं क्यों आज हम इन बातो को जानके ही रहेंगे। तो चलिए सुरु करते है : -
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इस महान समाज विज्ञानी के दुवारा दिआ गया इस सिद्धांत को समझने में अति सरल है। मैक्स वेबर के अनुसार जब हम किसी सामाजिक घटना के सत्य क्रम को अनुसंधान करने की कोसिस करते है तब उस घटना को अध्ययन करने से पहले हम इसकी एक काल्पनिक चित्र अपने मन में बना लेते है।
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1. भारत में कुल कितनी जाती है?
2. सामाजिक असमानता क्या है ?, प्रभाव और शिक्षा
3. दुनिआ के महान समाजशास्त्री [एक एक करके]
4. श्रमिक संघ की सुबिधा और असुबिधा
(रोज-मर्रा के जीबन में हर व्यक्ति इसका प्रयोग करता है और व्यक्ति के समस्या समाधान का उपाय ढूंढ़ना ही इसका प्रारम्भ होता है)
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(रोज-मर्रा के जीबन में हर व्यक्ति इसका प्रयोग करता है और व्यक्ति के समस्या समाधान का उपाय ढूंढ़ना ही इसका प्रारम्भ होता है)
उनके अनुसार ये काल्पनिक चित्र सम्पूर्णरूप से किसी सत्य के ऊपर प्रतिष्ठित नहीं होता। ये केबल मन से बनायी हुई एक पद्धिति होती है। ये काल्पनिक चित्र यही होती है, की कैसे हम किसी घटना को अध्ययन करेंगे और उससे क्या फल प्राप्त करेंगे।
(दुनिआ के हर एक अध्ययन में आदर्श रूप का प्रयोग होता है, चाहे वो प्राकृतिक विज्ञान का अध्ययन हो या फिर सामाजिक विज्ञानं का अध्ययन)
(दुनिआ के हर एक अध्ययन में आदर्श रूप का प्रयोग होता है, चाहे वो प्राकृतिक विज्ञान का अध्ययन हो या फिर सामाजिक विज्ञानं का अध्ययन)
वेबर के अनुसार किसी भी समजतात्विक घटना को अध्ययन करने का क्रम किसी समाजशास्त्रीक के मन में इसी आदर्श रूप से आरम्भ होता है। क्योकि इस संकल्पना के अलावा कोई भी समाजशास्त्रीक सामाजिक परिघटना को अध्ययन नहीं कर सकता।
(अगर कोई करता भी है तो उससे सत्य का उद्घाटन संभव नहीं हो पायेगा)
समाजशास्त्रीक इसके दुवारा पहले अपने मन में किसी सामाजिक परिघटना के ऊपर एक काल्पनिक चित्र तैयार कर लेता है। वो चित्र कुछ इस प्रकार के होते है - की कैसे वो उस घटना को अध्ययन करेगा, किस पद्धिति का प्रयोग करेगा, क्या फल प्राप्त करेगा इत्यादि इत्यादि।
(अगर कोई करता भी है तो उससे सत्य का उद्घाटन संभव नहीं हो पायेगा)
समाजशास्त्रीक इसके दुवारा पहले अपने मन में किसी सामाजिक परिघटना के ऊपर एक काल्पनिक चित्र तैयार कर लेता है। वो चित्र कुछ इस प्रकार के होते है - की कैसे वो उस घटना को अध्ययन करेगा, किस पद्धिति का प्रयोग करेगा, क्या फल प्राप्त करेगा इत्यादि इत्यादि।
दराचल ये आदर्श रूप प्रत्येक व्यक्ति के जीबन में क्रिया करता है। चाहे वो समाजशास्त्रीक हो या फिर साधारण मनुष्य।
आदर्श रूप के कुछ अति महत्वपूर्ण चरित्र इस प्रकार के है : -
1. सबसे पहले तो आदर्श रूप किसी भी सत्य के ऊपर प्रतिष्ठित नहीं होता। ये अध्ययनकारी के मन में एक काल्पनिक सत्य की तरह होता है, जो प्रमाणित हुआ नहीं होता।
2. किसी भी सामाजिक घटना को अध्ययन करने से पहले की अवस्था है आदर्श रूप। क्योकि आदर्श रूप के बिना किसी भी सामाजिक घटना को अध्ययन करना नामुमकिन या आशम्भव है।
3. दुनिआ में आज तक जितने भी सामाजिक या वेज्ञानीक सिद्धांत प्रतिष्ठित हुए है; वो सभी आदर्शरूप से स्तर से होकर ही गुजरे है।
4. आदर्श रूप एक सर्बजनिन परिघटना है। चाहे कोई व्यक्ति साधारण मनुस्य हो या फिर समाज विज्ञानी; सभी लोग आदर्श रूप का व्यबहार अपने जीबन में करते है।
दराचल प्रत्येक व्यक्ति आदर्शरूप का व्यबहार हर दिन करते रहते है लकिन परिघटनातात्विक ज्ञान के अभाव के कारण इस सत्य को नहीं जान पाते।
मैक्स वेबर एक ऐसे समाजविज्ञानी थे, जो चाहते थे की समाजशास्त्र को विज्ञानं की तरह प्रतिष्ठित किआ जाये, उनके इसी प्रयास का फल था ये आदर्श रूप।
मैक्स वेबर एक ऐसे समाजविज्ञानी थे, जो चाहते थे की समाजशास्त्र को विज्ञानं की तरह प्रतिष्ठित किआ जाये, उनके इसी प्रयास का फल था ये आदर्श रूप।
